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GK Tricks – बैंकिंग से सम्बंधित समितियों को याद रखने का Economics TRICKS

नमस्कार दोस्तों, आज हमलोग GK Tricks के अंतर्गत Economics Tricks पढेंगे।

तो आइए शुरू करते हैं:-

बैंकिंग सम्बन्धी समितियों पर आधारित Question अक्सर सभी Competitive Exams में पूछे जाते हैं।  हम अक्सर इन्हें याद करके भूल जाते हैं, तो दोस्तों इस पोस्ट में हम आपको एक ऐसी Economics Trick बताएँगे, जिससे कि आप बैंकिंग पर आधारित इन समितियों को याद रख सकेंगे।

बैंकिंग से सम्बंधित समितियों को याद रखने का Economics TRICKS

बैंक ने खंडेलवाल को गाँव दान दिया

बैंक = बैंक

खंडेलवाल = खंडेलवाल समिति

गा = गोइपोरिया समिति

व = वर्मा समिति

दा = दामोदरन समिति

न = नरसिंहम समिति

इस प्रकार हम आसानी से याद रख सकते हैं कि खंडेलवाल समिति, गाइपोरिया समिति, वर्मा समिति, दामोदरन समिति तथा नरसिंहम समिति बैंकिंग क्षेत्र से सम्बंधित समितियाँ हैं।

आइए, इन सामितियों के बारे में थोड़ा विस्तारपूर्वक जानते हैं:

खंडेलवाल समिति

यह समिति अनिल खंडेलवाल की अध्यक्षता में सार्वजानिक क्षेत्र के बैंकों  में मानव संसाधनों के विभिन्न मुद्दों यथा कर्मचारियों की नियुक्ति, ट्रेनिंग, कार्य संपादन, पुरस्कार तथा अवार्ड पर सुझाव देने के लिए 2010 में गठित की गयी थी जिसने 2012 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

गोइपोरिया समिति

एम.एन. गोइपोरिया की अध्यक्षता में इस समिति का गठन बैंकों में ग्राहक सुविधा सुधारने के लिए 1990 में किया गया था जिसने 1991 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस समिति के सुझाओं के आधार पर बैंकिंग लोकपाल योजना की शुरूआत 15 जून 1995 को की गई।

वर्मा समिति

एम.एस. वर्मा की अध्यक्षता में इस समिति का गठन कमजोर बैंकों की पुर्नसंरचना को ध्यान में रखते हुए 1998 में किया गया था जिसने अपनी रिपोर्ट 1999 में प्रस्तुत की। समिति ने यूको बैंक, इंडियन बैंक और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया को कमजोर बैंक घोषित किया और पुन:पूंजीकरण की सिफारिश की थी।

दामोदरन समिति

बैंकों में उपभोक्ता सेवाओं को बेहतर बनाने के मुद्दे पर सिफारिश देने के लिए गठित दामोदरन समिति ने 2011 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें अन्य सिफारिशों के साथ-साथ देश में 100000 नए एटीएम लगाने का लक्ष्य रखा था।

नरसिंहम समिति

भारत में वित्तीय प्रणाली की तत्कालीन संरचना तथा उसके विभिन्न अवयवों की आलोचनात्मक विवेचन के लिए इस 9 सदस्यीय समिति का गठन 1991 ई. में किया गया था। इसकी प्रमुख सिफारिशों में ब्याज दरों का नियमन समाप्त किया जाना, पूँजी पर्याप्तता अनुपात निश्चित करना तथा वित्तीय संस्थाओं के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना शामिल था।

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